नई दिल्ली : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अखिल भारतीय समन्वित चावल अनुसंधान परियोजना (AICRPR) के तहत जीन-संपादित धान की किस्मों — पूसा DST-1 और DRR धान 100 कमला — के बहु-स्थानिक परीक्षणों में पक्षपात के जो आरोप लगाए गए हैं, वे पूरी तरह से असत्य और तथ्यों से परे हैं। आईसीएआर के अनुसार ये दोनों किस्में अपने निर्धारित पर्यावरण (Targeted Environment) में अन्य वैरायटी की तुलना में बेहतर उपज देने में सक्षम हैं।
आईसीएआर ने बताया कि AICRPR की स्थापित वैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत देशभर के चावल उत्पादक संस्थान हर वर्ष अपनी विकसित किस्मों को बहु-स्थानिक परीक्षणों के लिए नामित करते हैं। इसके बाद इन किस्मों का करीब 2 से 3 वर्षों तक विभिन्न जलवायु-क्षेत्रों में स्वतंत्र मूल्यांकन किया जाता है। देशभर में लगभग 100 परीक्षण केंद्रों पर होने वाले इन ट्रायल्स को 1965 से लगातार वैज्ञानिक पारदर्शिता के साथ संचालित किया जा रहा है।
हर वर्ष लगभग 1200 से अधिक धान किस्मों का परीक्षण किया जाता है, और इसी कठोर वैज्ञानिक प्रक्रिया के कारण अब तक 1,750 से अधिक उत्तम गुणवत्तायुक्त एवं हाई-यील्डिंग धान किस्मों और हाइब्रिड का विकास संभव हो सका है।
आईसीएआर ने यह भी दोहराया कि जीन-संपादित किस्में भविष्य की कृषि चुनौतियों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं, और इन किस्मों का मूल्यांकन पूरी तरह वैज्ञानिक मानकों, पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ किया गया है।



























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