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प्राकृतिक खेती से बदलेगी किसानों की तकदीर, औरंगाबाद में हुआ विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम”

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देशी गाय के गोबर और गौमूत्र से बनेगा जैविक कीटनाशक, किसानों को मिला प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण”

कम लागत, ज्यादा मुनाफा और स्वस्थ मिट्टी:

औरंगाबाद, ओम शर्मा :🌱🚜 औरंगाबाद में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए कृषि विज्ञान केंद्र, सिरिस में आत्मा कार्यालय, औरंगाबाद द्वारा “प्राकृतिक खेती विषयक प्रशिक्षण कार्यक्रम” का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन औरंगाबाद सदर के माननीय विधायक श्री त्रिविक्रम नारायण सिंह, विधान परिषद सदस्य श्री दिलीप सिंह एवं जिला कृषि पदाधिकारी श्री संदीप राज ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया।कार्यक्रम की शुरुआत में उपस्थित अतिथियों को पौध गमला भेंट कर सम्मानित किया गया।

इसके बाद किसानों के लिए आयोजित प्रशिक्षण सत्र में प्राकृतिक एवं जैविक खेती से जुड़ी विभिन्न तकनीकों की विस्तृत जानकारी दी गई। कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक, जैविक नोडल पदाधिकारी, कृषि सखियां एवं जिले के विभिन्न प्रखंडों से आए बड़ी संख्या में किसान शामिल हुए।प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों को रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों से अवगत कराना तथा उन्हें प्राकृतिक एवं जैविक खेती की ओर प्रेरित करना था। कृषि विशेषज्ञों ने बताया कि वर्तमान समय में रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरा शक्ति प्रभावित हो रही है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ रही है और पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

ऐसे में प्राकृतिक खेती किसानों के लिए एक टिकाऊ और लाभकारी विकल्प बनकर उभर रही है।कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने किसानों को देशी गाय के गोबर एवं गौमूत्र से तैयार होने वाले जैविक कीटनाशकों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती में नीमास्त्र, जीवामृत और बीजामृत जैसे जैविक उत्पाद फसलों की सुरक्षा और बेहतर उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनका नियमित उपयोग मिट्टी की गुणवत्ता को बनाए रखने के साथ-साथ उत्पादन क्षमता में भी वृद्धि करता है।विशेषज्ञों ने किसानों को जैविक खाद निर्माण, जैव-कीट नियंत्रण, मिट्टी स्वास्थ्य सुधार, फसल विविधीकरण और कम लागत वाली कृषि तकनीकों की जानकारी भी दी। किसानों को बताया गया कि प्राकृतिक खेती न केवल खेती की लागत को कम करती है बल्कि पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण और मानव स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यंत लाभकारी है।कार्यक्रम के दौरान कई प्रगतिशील किसानों ने अपने अनुभव साझा किए और बताया कि प्राकृतिक एवं जैविक खेती अपनाने से उन्हें बेहतर उत्पादन, कम लागत और बाजार में अच्छी मांग का लाभ मिल रहा है। किसानों ने वैज्ञानिकों से विभिन्न तकनीकी विषयों पर प्रश्न पूछकर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान भी किया।माननीय जनप्रतिनिधियों ने किसानों से अपील की कि वे प्राकृतिक खेती को अपनाकर कृषि को लाभकारी बनाएं और आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ मिट्टी एवं स्वच्छ पर्यावरण का निर्माण करें। उन्होंने कहा कि सरकार भी प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाओं के माध्यम से किसानों को प्रोत्साहित कर रही है।कार्यक्रम के समापन पर किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने, जैविक कृषि तकनीकों को अपने खेतों में प्रयोग करने तथा टिकाऊ कृषि व्यवस्था के निर्माण में योगदान देने का संदेश दिया गया। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम किसानों को आत्मनिर्भर, पर्यावरण के प्रति जागरूक और आधुनिक कृषि तकनीकों से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।🌱🚜

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